पर्व और त्योहार

श्रीकृष्णप्रिया राधा रानी के जन्मोत्सव

Tuesday, August 29, 2017 12:05 PM

आज भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, राधाष्टमी है. प्रभु श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी श्रीराधारानी का आज जन्मदिवस है. पुष्टिमार्ग में आज का उत्सव भी जन्माष्टमी की भांति ही मनाया जाता है. विगत भाद्रपद कृष्ण पंचमी के दिन केसर से रंगे गये वस्त्र जन्माष्टमी एवं राधाष्टमी दोनों उत्सवों पर श्रीजी को धराये जाते हैं. आगामी वामन द्वादशी को धराये जाने वाले वस्त्र भी उसी दिन रंगे जाते हैं.

श्रीप्रभु की स्वामिनीजी श्री राधिकाजी का प्राकट्य आज के दिवस व्रज के बरसाना गाँव में वृषभान नामक गोप के यहाँ माता कीर्तिरानी के गर्भ से हुआ था. प्रभु श्रीकृष्ण से लगभग एक वर्ष पूर्व आपका जन्म हुआ परन्तु आपने नैत्र नहीं खोले. 11 माह और 15 दिवस पश्चात जब गोकुल में नंदरायजी के यहाँ प्रभु श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ और उसकी बधाई में जब थाली-मांदल बजाये गये तब आपने अपने नैत्र खोले.

श्री राधिकाजी के प्राकट्य के समय अलौकिक बालिका के दर्शन करने नारद मुनि, गर्गाचार्य जी, शांडिल्य मुनि आदि पधारे थे.
श्री राधिकाजी प्रभु की आनंदमयी शक्ति का प्राकट्य है.श्रीप्रभु के साथ आपने मधुरभाव से दानलीला, मानलीला, चीर-हरण लीला, रासलीला आदि कई अद्भुत लीलाएँ की है.

अत्यंत उत्साह एवं उमंग से आज का उत्सव मनाया जाता है.

श्रीजी का सेवाक्रम – उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरीर की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. शंखनाद प्रातः 4 बजे और मंगला दर्शन प्रातः 4.45 खुलते हैं.
मंगला दर्शन उपरांत प्रभु को चन्दन, आवंला एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है.

आज श्रीजी को नियम से केसरी रंग के वस्त्र एवं श्रीमस्तक पर कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धराये जाते हैं. गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनोरर (इलायची-जलेबी) के लड्डू, दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी एवं शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में पांचभात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात और वड़ी-भात) आरोगाये जाते हैं. राजभोग धरे पश्चात श्री राधिकाजी का जन्म होता है और इस भाव से प्रभु श्री गोवर्धनधरण को कुंकुम-अक्षत से तिलक किया जाता है.

तदुपरांत उत्सव भोग धरे जाते हैं जिसमें विशेष रूप से पंजीरी के लड्डू, छुट्टीबूंदी, खस्ता शक्करपारा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी (मलाई-पूड़ी), सफ़ेद-केसरी मावा की गुंजिया, केशरयुक्त बासोंदी, जीरा युक्त दही, रवा की खीर, घी में तले बीज-चालनी के सूखे मेवे, और विविध प्रकार के संदाना अरोगाये जाते हैं.

साथ ही श्रीजी को श्री नवनीतप्रियाजी, द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी एवं तृतीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री द्वारकाधीशजी के घर से सिद्ध होकर आये पंजीरी के लड्डू भी अरोगाये जाते हैं. उत्थापन समय फलफूल के साथ अरोगाये जाने वाले फीका के स्थान पर घी में तला हुआ बीज-चालनी का सूखा मेवा अरोगाया जाता है.

भोग-आरती के दर्शन में ढाढ़ी-ढाढन (नाच-गा कर बधाई देने वाले) आते हैं एवं मणिकोठा में हो रहे कीर्तन के दौरान दोनों नृत्य करते हैं. ढाढ़ीलीला होती है, ढाढ़ीलीला के पद गाये जाते हैं. इसके पश्चात दोनों को बधाई स्वरुप दान दिया जाता है.

ढाढ़ी-ढाढन दोनों पुरुष ही होते हैं. पिछले कई वर्षों से ढाढ़न के रूप में बुरहानपुर (महाराष्ट्र) के परम वैष्णव श्री बलदेवभाई सुन्दर स्त्रीवेश धर कर श्रीजी के समक्ष नृत्य करते हैं.

शयन समय डोल-तिबारी में ध्रुव-बारी के पास में प्रिया-प्रीतम के भाव से बिछायत होती है, कांच का बंगला धरा जाता है एवं विविध सज्जा की जाती है जो कि अनोसर में भी रहती है और अगले दिन शंखनाद पश्चात हटा ली जाती है.


आज वृषभान के आनंद ।
वृंदाविपिन विहारिनि प्रगटी श्रीराधाजु आनंद कंद ।।

गोपी ग्वाल गाय गो सुत लै चले यशोदा नंद ।
नंदी सुरर तें नाचत गावत आनंद करत सुछंद ।।
लेत विमल यश देत वसन पशु धरत दूब शिरवृंद ।

लोचन कुमुद प्रफुल्लित देखियत ज्यों गोरी मुखचंद ।।
जाचक भये परमधन कहियत गोधन सुधा अमंद ।

भये मनोरथ 'व्यास' दासके दूरि गए दुःख द्वंद ।।

साज - श्रीजी में आज लाल रंग की मखमल की सुनहरी ज़री की तुईलैस के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया के ऊपर लाल मखमल बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर सफेद मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज केसरी रंग की मलमल के रुपहली ज़री की तुईलैस से सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा- हीरे, मोती, माणक, पन्ना तथा स्वर्ण जड़ाव के आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर केसरी रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर उत्सव की मोती की चोटी (शिखा) धरायी जाती है. पीठिका के ऊपर प्राचीन हीरे-मोती के जड़ाव का चौखटा धराया जाता है. मुखारविंद पर केशरर से कपोलपत्र किये जाते हैं. पीले एवं श्वेत पुष्पों की विविध रंगों की थागवाली दो अत्यंत सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में कमलछड़ी, स्वर्ण जड़ाव के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.

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  • राधे राधे.