पूजा और पाठ

मथुरा में गिर्राज महाराज को छप्पनभोग

Thursday, January 04, 2018 17:10 PM

उत्तर प्रदेश में मथुरा के प्रसिद्ध गिर्राज महाराज का नये साल के आने के पहले से ही छप्पन भोग लगाने की होड़ मची हुई है। मान्यताओं के अनुसार (ठाकुरजी) ने स्वयं गिर्राज पूजन कर छप्पन भोग का आयोजन द्वापर में कराया था।

एक सप्ताह पहले से शुरू हुआ यह क्रम आज भी जारी है। सामान्यतया ब्रज के मंदिरों में अंग्रेजी कैलेन्डर की शुरूआत पर कोई कार्यक्रम आयोजित नही किया जाता किंतु देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां के मंदिरों में जाकर ठाकुरजी से नये साल पर अपने परिवार एवं देश की खुशहाली की कामना करते हैं।

जहां बहुत से तीर्थयात्री तो नगद धनराशि ठाकुरजी के श्रीचरणों में अर्पित कर श्रद्धा व्यक्त करते है वहीं कुछ लोग विभिन्न व्यंजन तैयार कराकर सामूहिक आराधना छप्पन भोग के रूप में करते हैं। चूंकि, द्वापर में ब्रजवासियों ने सामूहिक आराधना की थी और ठाकुरजी को भी सामूहिक एकता और सामूहिक आराधना पसंन्द है इसलिए समय समय पर ब्रज के मंदिरों में सामूहिक छप्पन भोग का आयोजन किया जाता है।

इस सप्ताह का सबसे बड़ा 156 टन का छप्पन भोग राधाकुंड के चारो तरफ लगाया गया था। यह छप्पन भोग जम्मू के संत बालक योगेश्वरदास द्वारा शहीदों की स्मृति में हर साल लगाया जाता है। इसके तहत जहां राधाकुंड में किशोरीजी श्यामसुन्दर की युगल छवि तैरते हुए मंच पर विराजमान थी तथा उनके चरणों में कुंड के चारो ओर सेब, केला, अमरूद, आम, नाशपाती, जामुन, संतरा, अनानास, खरबूजा, खुमानी समेत दो दर्जन से अधिक फलों से छप्पन भोग खुले में लगाया गया था। कुल फलों की मात्रा 156 टन थी।

आज दिन में लगाया गया भोग आरती के बाद हटेगा तथा नये वर्ष पर इसका वितरण साधुओं, संतों, गरीब बच्चों, गोवर्धन आनेवाले तीर्थयात्रियों में किया जाएगा। यही छप्पन भोग दर्जनों शहीद परिवारों को दिया जाएगा।अायोजन सचिव निर्भय गोस्वामी ने बताया कि नये साल पर इस छप्पन भोग का पान कर शहीदों के परिवारीजन बालक योगेश्वरदास के नेतृत्व में एक जनवरी को गिर्राज की सप्तकोसी परिक्रमा राष्ट्र के कल्याण के लिए करेंगे।

नये वर्ष के आगमन से एक सप्ताह पूर्व गोवर्धन में अलग-अलग तिथियों में आयोजित आधा दर्जन से अधिक छप्पन भोगों में दो छप्पन भोग अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। गिर्राज सेवा मंडल आगरा ने गिर्राज जी के अद्भुत छप्पन भोग आयोजन गोवर्धन में बड़ी परिक्रमा मार्ग की तलहटी पर किया गया था जिसमें आगरा के साथ साथ मथुरा, हाथरस, अलीगढ़, फिरोजाबाद, कानपुर तक के श्रद्धालु शामिल हुए थ।इस छप्पन भोग की जहां एक विषेशता यह थी कि इसमें लाखों श्रद्धालु शामिल हुए थे वहीं इसमें ठाकुरजी का अनूठा श्रंगार किया गया था। ’’कर मुरली उर माल’ के साथ साथ गोवर्धन को सबसे छोटी उंगली पर धारण किये गए गोपाल की छवि देखते ही बनती थी। इसमें व्यंजनों को पहाड़ की तरह सजाया गया था तो आस पास के वातावरण को वनों का रूप दिया गया था।’

भजनों ने वातावरण के कलेवर को धार्मिक रूप दिया था। ठाकुरजी के श्रंगार की छवि को जो भी देखता उसके मुंह से स्वतः निकल जाता-

"छटा तेरी तीन लोेक से न्यारी है गोवर्धन महराज"

इस छप्पन भोग में जो भी दर्शन के लिए आता उसे प्रसाद अवश्य दिया जाता है।

इसी श्रंखला मे दूसरे अविस्मरणीय छप्पन भोग का आयोजन ब्रजवासी सेवा समिति द्वारा भी गोवर्धन में दो दिन पूर्व किया गया था। जिसमें संगीतमय गिर्राज परिक्रमा के बाद अगले दिन गिर्राज जी का महाअभिषेक पंचामृत से करते समय केशर का उपयोग अधिक किया गया था।

केशर के अधिक उपयोग के संबंध में ब्रजवासी सेवा समिति के संस्थापक शशिभानु गर्ग ने बताया कि ब्रज में अधिकांशतः बालस्वरूप में ठाकुर की सेवा होती है।“लाला‘ को ठंड न लगे इसलिए ही अधिक से अधिक केशर का प्रयोग किया गया था।

इस आयोजन की दूसरी विषेशता ठाकुरजी का ऐसा श्रंगार था कि श्रद्धालु दर्शन के साथ ही भाव विभोर हो जाय। जब छप्पन भोग का पर्दा हटाया गया तो ऐसे अदभुत दर्शन कर श्रद्धालुओं के मुंख से बरबस ही निकल पड़ाः-

“गिर्राजधरण प्रभु तुम्हरी शरण रख लाज हमारी गोवर्धन”

कुल मिलाकर नये साल के अवसर पर न केवल गोवर्धन में कृष्णभक्ति की गंगा बह रही है बल्कि ब्रज के अन्य मंदिरों श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित आयोजनों से ब्रज का कोना कोना कृष्णमय हो उठा है।

यमुनाष्टक (पुष्टिमार्गी)

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा
मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम ।

तटस्थ नव कानन प्रकटमोद पुष्पाम्बुना
सुरासुरसुपूजित स्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम ॥१॥

कलिन्द गिरि मस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला
विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्ड्शैलोन्न्ता ।

सघोषगति दन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमा
मुकुन्दरतिवर्द्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता ॥२॥

भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैः
प्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः ।

तरंगभुजकंकण प्रकटमुक्तिकावाकुका-
नितन्बतटसुन्दरीं नमत कृष्ण्तुर्यप्रियाम ॥३॥

अनन्तगुण भूषिते शिवविरंचिदेवस्तुते
घनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे ।

विशुद्ध मथुरातटे सकलगोपगोपीवृते
कृपाजलधिसंश्रिते मम मनः सुखं भावय ॥४॥

यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियं भावुका
समागमनतो भवत्सकलसिद्धिदा सेवताम ।

तया सह्शतामियात्कमलजा सपत्नीवय-
हरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम ॥५॥

नमोस्तु यमुने सदा तव चरित्र मत्यद्भुतं
न जातु यमयातना भवति ते पयः पानतः ।

यमोपि भगिनीसुतान कथमुहन्ति दुष्टानपि
प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः ॥६॥

ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावता
न दुर्लभतमारतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये ।

अतोस्तु तव लालना सुरधुनी परं सुंगमा-
त्तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः ॥७॥

स्तुति तव करोति कः कमलजासपत्नि प्रिये
हरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः ।

इयं तव कथाधिका सकल गोपिका संगम-
स्मरश्रमजलाणुभिः सकल गात्रजैः संगमः ॥८॥

तवाष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदा
समस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः ।

तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यति
स्वभावविजयो भवेत वदति वल्लभः श्री हरेः ॥९॥

॥ इति श्री वल्लभाचार्य विरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम ॥