आध्यात्मिकता

चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है

Saturday, April 21, 2018 15:45 PM

 गर्मी हो या दोपहर की चिलचिलाती धूप या ठिठुरन भरे जाड़े की रात या भयंकर बारिश, फिर भी आगे बढ़ता हुजूम न तो रुकता है और न ही उसके प्रवाह में कोई कमी आती है। बस एक ही नारा लगता है, ‘‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है, जय माता दी।’’ बस मां की महिमा आगे बढ़ती जाती है एवं सबसे आश्चर्य की बात यह है कि यहां बिना बुलाए न तो कोई आ सकता है और न ही मां के बुलाने पर कोई भी प्राणी रुक सकता है।

 
मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों का साल के तीन सौ पैंसठ दिन तांता लगा ही रहता है जो न कभी दिन में रुकता है और न ही रात में। मां का दरबार 24 घंटे सभी प्राणियों के लिए खुला रहता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि मां के दरबार पर न कोई व्यक्ति का भेद, न कोई समाज का और न ही धन का भेद-भाव है। यहां तक कि मां लोगों से चढ़ावा तक नहीं लेती है बल्कि आने वाले भक्तों को अपना ही प्रसाद   सिक्के के रूप में प्रदान करती है।
 
मां के प्रति आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि वैष्णो देवी के द्वार में वही लोग पहुंच पाते हैं जिन्हें मां स्वयं बुलाती हैं। वैष्णो देवी मां के दरबार जाने के लिए कटरा से यात्रा पर्ची प्राप्त करना अनिवार्य है। यात्रा पर्ची के बिना आप यात्रा नहीं कर सकते। यह यात्रा पर्ची बस स्टैंड पर उपस्थित टूरिस्ट रिसैप्शन सेंटर, कटरा में मुफ्त एवं काफी सुविधा से मिलती है। यात्रा पर्ची के बिना यात्रियों को बाण-गंगा से वापस आना पड़ सकता है। यात्रा पर्ची सुबह 6 बजे से रात्रि के 10 बजे तक प्राप्त कर सकते हैं। भवन पर पहुंच कर यही पर्ची दिखाकर आप पवित्र गुफा के दर्शन कर सकते हैं। 
 
यहां विश्राम करने की व्यवस्था के साथ-साथ कम्बल, दरी, स्टोव तथा खाना बनाने के बर्तन आदि मूल्य जमा करने पर नि:शुल्क उपयोग के लिए मिल जाते हैं। इन वस्तुओं को लौटा देने पर आपका जमा किया गया रुपया पुन: वापस मिल जाता है। यह प्रबंध श्री माता वैष्णव देवी बोर्ड की ओर से किया गया है। 
 
 बस स्टैंड कटरा से ही यात्रा की शुरूआत होती है। इस स्थान पर काफी संख्या में होटल एवं धर्मशालाएं हैं जहां यात्री आने के बाद विश्राम करने के बाद बस स्टैंड पर स्थित श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड 1986 से यात्रा पर्ची प्राप्त कर आगे की यात्रा की शुरूआत करते हैं। यह यात्रा पर्ची नि:शुल्क दी जाती है एवं इसमें यात्रियों का विवरण तथा संख्या का उल्लेख किया जाता है।
 
बाण गंगा कन्या रूपी शक्ति मां जब उक्त स्थान से होकर आगे बढ़ीं तो उनके साथ-साथ वीर लंगूर भी चल रहे थे। चलते-चलते वीर लंगूर को जब प्यास लगी तो देवी ने पत्थरों में बाण मारकर गंगाजी को प्रवाहित कर दिया और प्रहरी की प्यास को तृप्त किया। इसी गंगा में ही देवी मां ने अपने केश भी धोकर संवारे इसलिए इसे बाण गंगा कहा जाता है।
 
इसी स्थान पर मां ने रुक कर पीछे की ओर देखा था कि भैरवयोगी आ रहे हैं। इसी कारण इस स्थान पर माता के चरण चिन्ह बन गए, इसलिए इस स्थान को चरण पादुका के नाम से जाना जाता है। बाण गंगा से इसकी दूरी 1.5 किलोमीटर है।
 
अद्धकुआरी इस स्थान पर दिव्य कन्या ने एक छोटी गुफा के समीप एक तपस्वी साधु को दर्शन दिए और उसी गुफा में नौ महीने तक इस प्रकार रहीं जैसे कोई शिशु अपनी माता के गर्भ में नौ माह तक रहता है। तपस्वी साधु ने भैरव को बताया था कि वह कोई साधारण कन्या नहीं अपितु महाशक्ति है और अद्धकुआरी है। भैरव ने जैसे ही गुफा में प्रवेश किया, माता ने त्रिशूल का प्रहार करके गुफा के पीछे दूसरा मार्ग बनाया और निकल गई। इस गुफा को गर्भजून एवं  अद्धकुआरी कहा जाता है। यह चरण पादुका से 4.5 किमी. दूरी पर स्थित है।
 
हाथी मत्था अद्धकुआरी से आगे क्रमश: पहाड़ी यात्रा सीधी खड़ी चढ़ाई के रूप में प्रारंभ हो जाती है। इसी कारण इसे हाथी मत्था के समान माना जाता है परंतु सीढिय़ों वाले रास्ते की अपेक्षा घुमावदार पहाड़ी पगडंडी से जाने से चढ़ाई कम मालूम होती है।  
 
सांझी छत हाथी मत्था की चढ़ाई के बाद यात्री सांझी छत पहुंचते हैं। इस छत को दिल्ली वाली छबील भी कहा जाता है। इस स्थान पर पहुंचने के बाद माता के दरबार तक केवल सीधे एवं नीचे की ओर जाने का मार्ग है। हर पल रास्ते की सफाई की जाती है। भिखारियों के भीख मांगने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है।
 
माता के भवन जाने के पूर्व सबसे पहले दिखाकर क्यू (लाइन) का नम्बर लेना अति जरूरी हो जाता है। इसके बाद आप क्रम से पंक्तिबद्ध होकर मां के दर्शन हेतु जा सकते हैं।ज्ञात रहे मां के पास जाने के पूर्व आप कैमरा, चमड़े का सामान, कंघी, जूता-चप्पल, बैग आदि को भवन के क्लाक रूम में जमा करा दें। इसके बाद ही आप जा सकते हैं। मां के पास जाने के बाद आपको वहां एकाग्र मन से मां का स्मरण करना पड़ेगा। यहां किसी प्रकार का फोटो एवं मिट्टी की तस्वीर नहीं है। वहां मात्र मां की पिंडी है जिसके दर्शन कर यात्रियों की थकान अपने आप दूर हो जाती हैं। मां के पीछे से शुद्ध एवं शीतल जल प्रवाहित होता रहता है जिसे चरण गंगा कहते हैं।
 
मां के भवन के पास ठहरने की भी अच्छी व्यवस्था के साथ ही साथ मुफ्त में कम्बल भी मिलता है जिसे प्रयोग करने के बाद लौटाना अनिवार्य है। खाने-पीने की दुकानों के अलावा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, पोस्ट ऑफिस, बैंक एवं पुलिस सहायता भी यहां उपलब्ध है। 
 
मां के दर्शन के पश्चात् आपका भैरों मंदिर जाना अनिवार्य है क्योंकि मां ने भैरों को मारने के बाद आशीर्वाद दिया था कि मेरे दर्शनों के पश्चात् भक्त तेरे भी दर्शन करेंगे, तभी उनकी मनोकानाएं पूर्ण होंगी। भैरों मंदिर का इतिहास मां आगे बढ़ती रही-भैरव पीछा करता रहा। गुफा के द्वार पर मां ने वीर लंगूर को प्रहरी बनाकर खड़ा कर दिया ताकि भैरव अंदर न आ सके। मां गुफा में प्रवेश कर गई तो पीछे-पीछे भैरव भी घुसने लगा। लंगूर ने भैरव को अंदर जाने से रोका जिसके लिए भैरव के साथ लंगूर का भयंकर युद्ध हुआ। फिर मां ने शक्ति यानी चंडी का रूप धारण कर भैरव का वध कर दिया। धड़ वहीं गुफा के पास तथा सिर भैरव घाटी में जा गिरा। जिस स्थान पर भैरों का सिर गिरा था, इसी जगह भैरों मंदिर का निर्माण हुआ है। मां के भवन से भैरों मंदिर की दूरी लगभग 4 कि.मी. है जो काफी ऊंचाई पर है। यहां आप घोड़ा-खच्चरों से भी जा सकते हैं। मां के आशीर्वाद के कारण ही लोग वापसी में भैरों मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं।