आध्यात्मिकता

मोहिनी एकादशी: व्रत कथा के साथ जानें रात्रि जागरण की महिमा

Thursday, April 26, 2018 09:45 AM
सरस्वती नदी के किनारे बसे भद्रावती नगर में द्युतिमान नामक चन्द्रवंशी राजा राज्य करता था तथा उसी नगर में एक धन-धान्य से परिपूर्ण एवं शांत स्वभाव वाला धनपाल नामक वैश्य भी रहता था। वह रोजाना किसी न किसी पुण्यकर्मों में लगा रहता था। उसने जनहित्त में अनेक कुंए, पोखरे, प्याऊ लगवाएं तथा धर्मशालाएं, मठ एवं बगीचे बनवाकर लोगों की अत्याधिक सेवा की। उसने सड़कों के किनारे आम, नीम व जामुन आदि के अनेक छायादार पेड़ लगवाए। भगवान विष्णु की कृपा से उसके पांच पुत्र थे। जिनमें सुमना, सदबुद्घि, मेधावी और सुकृति तो अपने पिता के समान बड़े धर्मात्मा थे परंतु धृष्टबुद्घि अपने नाम के अनुकूल ही बड़ा दुष्ट था। उसका मन सदा ही पापों में लगा रहता था। वह अपने पिता के धन का दुरुपयोग करता रहता था तथा उसने न तो देवी-देवताओं का पूजन किया और न ही ब्राह्मणों एवं पितरों का कभी आदर सत्कार किया। 
 
 
एक दिन उसके पिता ने तंग आकर दुखी ह्रदय से उसे उसके दुराचरण के लिए घर से निकाल दिया तब उसके सभी बंधु-बांधवों ने भी उसका परित्याग कर दिया। ऐसे में दुखी होकर वह भूख-प्यास से परेशान होकर इधर-उधर भटकने लगा। कहते हैं जब किसी के पुण्यकर्म उदय होते हैं तो उन्हें संतों के दर्शन करने तथा उनके उपदेश सुनने का मौका मिलता है।
 
 
ऐसे ही किसी पिछले पुण्यकर्म के प्रभाव से धृष्टबुद्घि घूमते हुए महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम में जा पहुंचा। तब वैशाख का महीना चल रहा था तथा महर्षि गंगा स्नान करके लौट रहे थे। धृष्टबुद्घि महर्षि के सामने हाथ जोड़कर उनसे अपने दुखों को दूर करने के लिए प्रार्थना करने लगा तो उन्हें उस पर दया आ गई। महर्षि ने उसे मोहिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। व्रत के प्रभाव से वह अपने सभी पाप बंधनों से छूट गया तथा अंत में उसे प्रभु का परमधाम प्राप्त हुआ।  
 
 
विद्वानों के अनुसार एकादशी व्रत में रात्रि जागरण की अत्यधिक महिमा है। इस लिए व्रत करने वाले को चाहिए कि वह रात को धरती पर शयन करे तथा अपना अधिक से अधिक समय प्रभु नाम संकीर्तन में बिताए। यदि कोई यह व्रत नहीं भी कर सकता तो एकादशी के दिन चावल न आप खाएं तथा न किसी को खाने को दें। इस दिन तुलसी और सूर्यदेव को जल चढ़ाना और तुलसी मंदिर में दीपदान करना अति उत्तम फल दायक है।