निम्बार्क सम्प्रदाय

श्री निम्बार्क सम्प्रदाय

Sunday, March 26, 2017 22:20 PM

निम्बार्काचार्य एक महत्त्वपूर्ण वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य के रूप में प्रख्यात रहे हैं। यह ज्ञातव्य है कि वैष्णवों के प्रमुख चार सम्प्रदायों में निम्बार्क सम्प्रदाय भी एक है। इसको 'सनकादिक सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि निम्बार्क दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के तट पर वैदूर्य पत्तन के निकट (पंडरपुर) अरुणाश्रम में श्री अरुण मुनि की पत्नी श्री जयन्ति देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। कतिपय विद्वानों के अनुसार द्रविड़ देश में जन्म लेने के कारण निम्बार्क को द्रविड़ाचार्य भी कहा जाता था।

द्वैताद्वैतवाद या भेदाभेदवाद के प्रवर्तक आचार्य निम्बार्क के विषय में सामान्यतया यह माना जाता है कि उनका जन्म 1250 ई. में हुआ था। श्रीनिम्बार्काचार्य की माता का नाम जयन्ती देवी और पिता का नाम श्री अरुण मुनि था। इन्हें भगवान सूर्य का अवतार कहा जाता है। कुछ लोग इनको भगवान के सुदर्शन चक्र का भी अवतार मानते हैं तथा इनके पिता का नाम श्री जगन्नाथ बतलाते हैं। वर्तमान अन्वेषकों ने अपने प्रमाणों से इनका जीवन-काल ग्यारहवीं शताब्दी सिद्ध किया है। इनके भक्त इनका जन्म काल द्वापर का मानते हैं। इनका जन्म दक्षिण भारत के गोदावरी के तट पर स्थित वैदूर्यपत्तन के निकट अरुणाश्रम में हुआ था। ऐसा प्रसिद्ध है कि इनके उपनयन के समय स्वयं देवर्षि नारद ने इन्हें श्री गोपाल-मन्त्री की दीक्षा प्रदान की थी तथा श्रीकृष्णोपासना का उपदेश दिया था। इनके गुरु देवर्षि नारद थे तथा नारद के गुरु श्रीसनकादि थे। इसलिये इनका सम्प्रदाय सनकादि सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है। इनके मत को द्वैताद्वैतवाद कहते हैं।

निम्बार्क का जन्म भले ही दक्षिण में हुआ हो, किन्तु उनका कार्य क्षेत्र मथुरा रहा। मथुरा भगवान श्री कृष्ण की जन्म भूमि रही, अत: भारत के प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्रों में मथुरा का अपना निजी स्थान रहता चला आया है। निम्बार्क से पहले मथुरा में बौद्ध और जैनों का प्रभुत्व हो गया था। निम्बार्क ने मथुरा को अपना कार्य क्षेत्र बनाकर यहाँ पुन: भागवत धर्म का प्रवर्तन किया।

निम्बार्क सम्प्रदाय का विकास दो श्रेणियों में हुआ, एक विरक्त और दूसरी गृहस्थ। आचार्य निम्बार्क के दो प्रमुख शिष्य थे, केशव भट्ट और हरि व्यास। केशव भट्ट के अनुयायी विरक्त होते हैं और हरि व्यास के अनुयायी गृहस्थ। निम्बार्क सम्प्रदाय में राधा और कृष्ण की पूजा होती है। ये लोग गोपीचन्दन का तिलक लगाते हैं और श्रीमद्भागवत इनका प्रमुख सम्प्रदाय ग्रन्थ है। भारत में अब भी इस सम्प्रदाय के अनुयायी पर्याप्त संख्या में हैं। सम्प्रदाय के रूप में निम्बार्क परम्परा को आगे बढ़ाने वाले उत्तरवर्ती आचार्यों में गोस्वामी श्री हित हरिवंश, श्री हरि व्यास और स्वामी हरिदास की गिनती प्रमुख रूप से की जाती है। उत्तरवर्ती आचार्यों में माधव मुकुन्द (1700- 1800 ई.) भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

भगवान श्री निम्बार्काचार्य से शुरू होने वाले संप्रदाय की अखंड रेखा अब पांच हजार से अधिक वर्षों तक जारी रहती है। वर्तमान में सम्प्रदाय का मुखिया जगदगुरु निंबाराचार्य श्री श्री महाराज और श्री शुक्देवदास महाराज जी संप्रदाय के 53 वां आचार्य थे।

वृन्दावन, नंदग्राम, बरसाना और गोवर्धन प्रमुख क्षेत्रिय निंबर्कचार्य के अनुयायियों की पवित्र भूमि हैं। बृज भूमि के 168 मील की परिक्रमा उनकी सबसे बड़ी कर्तव्य है।


सोलह अक्षर मंत्र
राधे कृष्ण राधे कृष्णा, कृष्ण कृष्ण राधे राधे |
राधे श्याम राधे श्याम, श्याम श्याम राधे राधे ||