निम्बार्क सम्प्रदाय

महाराज जी

Monday, April 03, 2017 14:45 PM

अनंत श्री विभूषित श्री श्री 108 श्री शुकदेवदास महाराज का जन्म 1844 में (काल 1968 विक्रम सम्वत) धरती पर कर्तिक महीने के तृतीया चतुर्थी तिथि के शुभ दिन मे हुआ था । उनके पिता श्री जमुना प्रसाद सिंह और माता श्रीमती गुलाब देवी थी । उनका ज्न्म एक बहुत ही सम्पन  घराने में हुआ था| वह एक विलक्षण प्रतिभा के बच्चे थे और इसलिए उनका नाम श्री नारायण प्रसाद सिंह रखा गया था । यह माना जाता है कि श्री माउनी बाबा, उनकी  माता - पिता  को आशीर्वाद देते हुए कहा था की उनके यहाँ एक पुत्र आएगा पर वह आपके परिवार के लिए नहीं होगा वो हमारे काम आएगा | फिर आगे चलकर यही बालक एक प्रसिध महापुरुष बनेगा और प्रभु की महिमा को जीवन भर फैलाते रहेगा | उनका बचपन छः भाइयों और दो बहनो के साथ बीता । श्री महाराज  जी का बचपन से ही पूजा पाठ मे ही ध्यान रहता था |

जब श्री महाराज जी की आयु लगभग 12 वर्ष की थी उसी समय  उन्होने घर त्याग दिया और ईश्वर की सेवा में अपने आप को समर्पित कर दिया |केवल एक ही सच्चाई के लिए घर छोड़ा, जिसे उन्होंने जीवन में बहुत ही प्रारंभिक समय में ही अनुभव किया। निश्चित रूप से उन्होंने श्री त्यागी जी महाराज जी से एक दिव्या मार्गदर्शन प्राप्त करने में कामयाब रहे और इनका नाम शुकदेवदास महाराज  रखा गया। इसके बाद  तन्मन्यता पूर्वक अपने गुरु के मार्ग और श्री राधा-कृष्णा के दिव्य आशीर्वाद को सांसारिक जीवन के दायरे से परे दिव्यता का हिस्सा बनने के लिए अपनाया। श्री महाराज जी ने कभी अपने शरीर की प्रवाह नहीं की और दिन रात अपने अराध्य राधा-कृष्णा की सेवा में लगे रहे| उन्होने कई आश्रमों का निर्माण भी किया| वो लगातार अपनी माला का जाप किया करते थे | और अपना ध्यान पूरी तरह से भजन अभ्यास में केंद्रित कर लिया करते थे |

उनके शिष्य पूरे भारत वर्ष से उनके दर्शनों और पूजा अर्चना के लिए आया करते थे| वो उन्हे अपना आशीर्वाद देने के साथ हमेशा अपने अराध्य राधा-कृष्णा की सेवा और भजन के लिए प्रेरित किया करते थे| श्री महाराज जी संगीत में भी प्रकांड विद्वान थे | इन्हे सन्गीताचार्य की संज्ञा से भी विभूषित किया गया था | इनके गीत-संगीत का उद्देश्य शुद्ध रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक था |


सौ वर्ष के बाद वे अस्वस्थ  रहने लगे | उनके इलाज लगातार चलता रहा पर सेहत में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ | वो लगातार अपनी माला का जाप किया करते थे | और अपना ध्यान पूरी तरह से भजन अभ्यास में केंद्रित कर लिया था | यदि कोई प्रेमी उनसे उनके स्वास्थ के विषय मे पूछता तो वो हमेशा यही कहते थे की मैं ठीक हूँ और कभी अपने शारीरिक कष्ट की चर्चा नहीं की| एकबार प्रेमियों ने उनसे अर्ज़ की महाराज जी आप तो समस्त शक्तियों के मलिक हैं और आप खुद ही अपने स्वास्थ को ठीक कर संकते हैं | हमारी आपसे प्राथना है की आप अपने आपको स्वस्थ करें क्योंकि सब आपको पहले की तरह ही खुश हाल देखना चाहते हैं | इस पर उन्होने फरमाया की क्या हम जीवन भर के भजन अभ्यास की कमाई इस शरीर को ठीक करने पर लगा दें और उन्होने ऐसा करने से मना कर दिया | ये भी उनकी एक महानता ही थी की सब सक्षम होते हुए भी उन्होने अपने शरीर की परवाह ना की| और हमेशा भजन अभ्यास श्री राधा-कृष्णा में ही अपना ध्यान लगाये रखा | 21 march 2014 फिर सूर्यास्त के समय लगभग शाम के 7 बजे वो अपने शरीर को छोड़ कर निज धाम सिधार गये | आज उस स्थान पर एक भवय समाधी का निर्माण किया गया है | ये आज भी प्रेमियों को घर, व्यापार आदि में बरकत पहुँचा रहे हैं| श्री महाराज जी आज भी प्रेमियों को उस स्थान से अपना आश्रीवाद प्रदान कर रहे हैं और उनकी किरपा सब पर बरस रही है|